Tuesday, 19 August 2014

परिभाषा

किनारे सागर के खड़े हो किल्लोल करती लेहरों पर
जीवन की परिभाषा सुझायी जा सकती है !
सुख और दुःख लहरों की तरह आते हे और चले जाते है,
एक दुःख पुराने सुख की लहर को मिटा देता है ,
तो एक नया सुख पुराने दुःख के ज़ख्मो को भर देता है ,
ऐसी ही हे न ज़िन्दगी अजीब वाक़्यातो से भरी ,
एक हादसा ज़िन्दगी के मायनो को बदल देता है ,
तो दूसरा उन मायनो को नया आयाम देता है ,
विस्तृत हे जीवन का तल,
कहीं उभरा कहीं गहरा , कहीं समतल कहीं अवतल,
कहीं वनों की तरह हरियाली दृश्य आती हे,
कहीं रेगिस्तानों की रेत अपना अस्तित्व दिखती है,
कहीं कल कल करते झरनें एक सत्य को परिभाषित करते है,
तो कहीं बूँद- बूँद को यह नैन तरसतें है,
कितनी ही ज़िंदगियाँ हर एक ज़िन्दगी से जुड़ी होती है,
फिर भी हर एक ज़िन्दगी अकेली होती है,
फिर से लौटते हे सागर की विशालता की और,
सिर्फ यही गुण हम नहीं अपना सकते ,
विशालता ह्रदय की, विस्तृतता ह्रदय की , संतृप्तता ह्रदय की,
जीवन दो पारियों में चलता है ,
हर नयी सुबह के साथ,
जैसे एक पल ज्वार भाटा आया हो और अशांत हो गया हो समुद्र,
और दूसरे क्षण शांत अचल किसी सन्यासी की तरह,
मुश्किल है जीवन को परिभाषित करना,
कठिन हे उसे शब्दों में व्यक्त करना,
एक उलझा सा ताना बाना है ,
जिसे हर एक को ही सुलझाना है,
ज़िन्दगी , ज़िन्दगी , ज़िन्दगी बस इसी के बारे में जानते जानते "सुर ",
कब उम्र निकल जाती है ,
कब जीवन की साँझ आ जाती है,
पता नहीं चलता !!