Sunday, 6 April 2014

चंद जज़्बात




सजा केसे दे जिसे हर शख्स से अलग माना था हमनें तो खंजर वाले हाथों में अपनी हस्ती सोंप दी 

इतने बुरे हम भी नहीं थे जो हज़ारो को छोड़ हमने उसे चाहा उसकी बेवफाई में इतनी भी हया नहीं थी जो हमारी वफ़ा के दामन क पीछे छुप जाती 

मेरा ही गुमान मुझे ले डूबा जब किस्मत ने नज़रें तरेर कर मेरी तरफ देखा !!

 Khanabadosh si ho gayi hai Zindagi... Ghar Laut ke bhi lagta hai Abhi Safar mein hoon 

अधूरे बिखरे ख़्वाबों के मोती अलमारी से निकाले हे आज मेंने शायद फिर एक धागे ने उम्मीद की आहट की है !! सुधा राम जोशी 


अच्छा हुआ जो उसने छोड़ दिया हमे वरना फ़कीर के हाथ में आकर हीरा बिकता भी तो बस एक रोटी क लिए "सुर" "सुधा राम जोशी " 


इश्क़ के कानून कि रियायतें देखिये हज़ारो फतवें निकालता है सजा-ए- बेवफाई के पर हर सजा में गुंजाइश होती हे उसके लौट आने की.. !! सुधा राम जोशी


 Being Grounded is my Hobby... Being Loving is my Passion... Being Loved is my Reward 


जीवन क्षणिक हे या मृत्यु अर्थहीन हे यह प्रस्तावना सम्वेदनायें अकाल हे उन्हें ही प्रकल्पित करो इस जीवन और पार उस जीवन के बस वही जीवंत हे सुधा राम जोशी


मेरी ही जेब के सिक्के मेरे नहीं,
पत्थर की दीवारों के घर पक्के नहीं,
चौक में गिरती बारिश के हिस्से भी मेरे नहीं,
बस सुख दुःख की शतरंज मेरी, रात ही रात मेरी,
मेरे बक्से में सवेरे नहीं ।। सुधा राम जोशी ।।


वो बूंदे भी झूम के गिरी, बादल का हाथ छोड़ के।
कुछ लोग बिखर क्यों जाते हे, जो कोई एक साथ छोड़ दे।।

इश्क़-ए-सजा

इश्क़ के कानून कि रियायतें देखिये 
हज़ारो फतवें निकालता है सजा-ए- बेवफाई के 
पर हर सजा में गुंजाइश होती हे उसके लौट आने की.. !!
सुधा राम जोशी

तस्वीरो का मेला

अति से अतिश्योक्ति बन गयी
रचना एक अभिव्यक्ति बन गयी
उन्होंने चंद लफ्ज़ो के साथ जो तस्वीर उकेरी थी
वो न जाने केसे एक कीमती कलाकृति बन गयी,

आज जब उतरे हम उस तस्वीर को लेके बाज़ार में
ऊँची बोली कि उम्मीद में बेठ
पर इस ज़माने में कद्रदानों कि इतनी कमी निकली
वो अद्भुत कला कि बस एक क्षति बन गयी,

दीवार पर कोने में कुछ अजीब सी तस्वीरों के बीच
वो दुबकी सहमी अकेली सी लग रही थी
लोग अचरज से देख उसे कानाफूसी करते हुए
आगे बढ़ जाते थे,

एक व्यक्ति अपनी जिज्ञासा कि सीमाओं को लांघ चूका था
विचलित अनजान मन में ये मान चुका था
हो न हो यह अतीत का कोई अलौकिक भाग रहा होगा
इस तस्वीर, इस कृति का कोई इतिहास रहा होगा,

खोजने लगा वो पुस्तकालय कि हर धूळ भरी किताब को
झाड़ते मुख्य पृष्ठ और बीच पन्नों के भाग को
थक गया लेकिन समय था कि कोई उत्तर नहीं दे रहा था
वोह अपनी ऊर्जा और धैर्य क्षण क्षण खो रहा था,

अचानक एक छोटी, फटी सी किताब द्युति बन गयी
घुप्प रात में जेसे एक रौशनी मिल गयी,

एक भूरी, जीर्ण से पन्नों कि पुस्तक में झाँका तो
नन्हे नन्हे अक्षरो में उस कृति का इतिहास पता चला
गुण था वोह एक पूर्व काल में वर्णित
मन उसका था उपलभ्धि भरा
हो गया था जिज्ञासा का बंद दिया प्रकीर्णित,

वो कृति जानते हे क्या थी ?
नैतिकता
जिसका भी एक असीम इतिहास था
आज तस्वीरो के मेले में होना भी
सिर्फ उसका एक उपहास था

ना पाठ्यक्रम में जिक्र उसका
न दैनिक जीवन में उसकी कोई परिकल्पना हे
आज इतिहास कि इस "विलुप्त प्रजाति " को मनु में पाना "सुर"
एक अतिरेक, असंभावित कल्पना है।

सुधा राम जोशी