अति से अतिश्योक्ति बन गयी
रचना एक अभिव्यक्ति बन गयी
उन्होंने चंद लफ्ज़ो के साथ जो तस्वीर उकेरी थी
वो न जाने केसे एक कीमती कलाकृति बन गयी,
आज जब उतरे हम उस तस्वीर को लेके बाज़ार में
ऊँची बोली कि उम्मीद में बेठ
पर इस ज़माने में कद्रदानों कि इतनी कमी निकली
वो अद्भुत कला कि बस एक क्षति बन गयी,
दीवार पर कोने में कुछ अजीब सी तस्वीरों के बीच
वो दुबकी सहमी अकेली सी लग रही थी
लोग अचरज से देख उसे कानाफूसी करते हुए
आगे बढ़ जाते थे,
एक व्यक्ति अपनी जिज्ञासा कि सीमाओं को लांघ चूका था
विचलित अनजान मन में ये मान चुका था
हो न हो यह अतीत का कोई अलौकिक भाग रहा होगा
इस तस्वीर, इस कृति का कोई इतिहास रहा होगा,
खोजने लगा वो पुस्तकालय कि हर धूळ भरी किताब को
झाड़ते मुख्य पृष्ठ और बीच पन्नों के भाग को
थक गया लेकिन समय था कि कोई उत्तर नहीं दे रहा था
वोह अपनी ऊर्जा और धैर्य क्षण क्षण खो रहा था,
अचानक एक छोटी, फटी सी किताब द्युति बन गयी
घुप्प रात में जेसे एक रौशनी मिल गयी,
एक भूरी, जीर्ण से पन्नों कि पुस्तक में झाँका तो
नन्हे नन्हे अक्षरो में उस कृति का इतिहास पता चला
गुण था वोह एक पूर्व काल में वर्णित
मन उसका था उपलभ्धि भरा
हो गया था जिज्ञासा का बंद दिया प्रकीर्णित,
वो कृति जानते हे क्या थी ?
नैतिकता
जिसका भी एक असीम इतिहास था
आज तस्वीरो के मेले में होना भी
सिर्फ उसका एक उपहास था
ना पाठ्यक्रम में जिक्र उसका
न दैनिक जीवन में उसकी कोई परिकल्पना हे
आज इतिहास कि इस "विलुप्त प्रजाति " को मनु में पाना "सुर"
एक अतिरेक, असंभावित कल्पना है।
सुधा राम जोशी
रचना एक अभिव्यक्ति बन गयी
उन्होंने चंद लफ्ज़ो के साथ जो तस्वीर उकेरी थी
वो न जाने केसे एक कीमती कलाकृति बन गयी,
आज जब उतरे हम उस तस्वीर को लेके बाज़ार में
ऊँची बोली कि उम्मीद में बेठ
पर इस ज़माने में कद्रदानों कि इतनी कमी निकली
वो अद्भुत कला कि बस एक क्षति बन गयी,
दीवार पर कोने में कुछ अजीब सी तस्वीरों के बीच
वो दुबकी सहमी अकेली सी लग रही थी
लोग अचरज से देख उसे कानाफूसी करते हुए
आगे बढ़ जाते थे,
एक व्यक्ति अपनी जिज्ञासा कि सीमाओं को लांघ चूका था
विचलित अनजान मन में ये मान चुका था
हो न हो यह अतीत का कोई अलौकिक भाग रहा होगा
इस तस्वीर, इस कृति का कोई इतिहास रहा होगा,
खोजने लगा वो पुस्तकालय कि हर धूळ भरी किताब को
झाड़ते मुख्य पृष्ठ और बीच पन्नों के भाग को
थक गया लेकिन समय था कि कोई उत्तर नहीं दे रहा था
वोह अपनी ऊर्जा और धैर्य क्षण क्षण खो रहा था,
अचानक एक छोटी, फटी सी किताब द्युति बन गयी
घुप्प रात में जेसे एक रौशनी मिल गयी,
एक भूरी, जीर्ण से पन्नों कि पुस्तक में झाँका तो
नन्हे नन्हे अक्षरो में उस कृति का इतिहास पता चला
गुण था वोह एक पूर्व काल में वर्णित
मन उसका था उपलभ्धि भरा
हो गया था जिज्ञासा का बंद दिया प्रकीर्णित,
वो कृति जानते हे क्या थी ?
नैतिकता
जिसका भी एक असीम इतिहास था
आज तस्वीरो के मेले में होना भी
सिर्फ उसका एक उपहास था
ना पाठ्यक्रम में जिक्र उसका
न दैनिक जीवन में उसकी कोई परिकल्पना हे
आज इतिहास कि इस "विलुप्त प्रजाति " को मनु में पाना "सुर"
एक अतिरेक, असंभावित कल्पना है।
सुधा राम जोशी
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