Monday, 16 December 2013

विश्वास या अविश्वास

अविश्वासित से जीवन कि
अबूझ सी पहेली,
एक मुट्ठी भर ख़ुशी
एक दुखभर हथेली!

मंन के हर कोने में एक बालक बेठा सा लगता है
जो मुट्ठी भर ख़ुशी देख के खिलखिलाता है,
चंद पल में दुःख कि हथेली देख
रुआंसा सा हो जाता है!

में जीवन को समझ पायी जितना
उतना तोह कण भर भी नहीं,
सुख दुःख कि एक सीढ़ी है,
पग पग परिवर्तन है,
दृढ़ता क्षण भर भी नहीं!

कौन सुखी है इस जीवन के मर्म से
यह प्रश्न विचलित करने वाला है,
जिधर दृष्टि जाती है
उसके चक्षु ही जलमय है,
यह परिदृश्य भी भावुक करने वाला है!

अविश्वनीय जीवन एक मृग मरीचिका सी प्रतीत होती है
हर एक हृदय में असंतोष कि दशा भावातीत होती है,
एक परिकल्पना थी मेरी कि
प्रसन्नता का हर मन में वास हो,
एक समर्पित, अलौकिक शक्ति का हर चेतना में सुवास हो
पर कल्पना अतिरेक है,
जीवन से भिन्न
पर अंग है यह हर जीवन का अभिन्न!

आशाएं अभिलाषाएं जब अकार विस्तृत कर लेती है
हथेली भर दुःख, मुट्ठी भर ख़ुशी के सामने नतमस्तक हो जाता है,
और जीवन के इन दो चक्रो के साथ भी
मान लीजिये मेरी  कल्पनारूप "सुर",

जीवन अविश्वसनीय हो जाता है !!!

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